Vignettes of a South African Township called Mdantsane

Thursday, December 8, 2011

Gwalior

Photobucket

many aeons back
when rock changed faces
many a times and clan men
resisted irrefutably
time
the sky always gave way
to unhindered horizons
to newer lives
in dust torn
revelry
each time we passed the long
languorous tunnels of
waking
each time we found
ourselves on ledges
of looming betrayal
the fort grew taller and higher
overlapping many a skin
many a shadow
many a summers
and i thought
perhaps one day
you would tell me a secret
of holding the lizard
in my grip
of a moment
knee deep in a drying river
of your breath
navigating a stronghold
of refute
you told me
the ruddy earth would also change
the peacocks would be no more
fungus and fern would darken
such agreements
such love
insisted
and we would remain torn
answerable only to the wind.


why did we run away each time the
sun changed surfaces
why did we cross eye storms
ensnared long hidden stars
why did we eclipse in patterns
of lip talk on your neck
why did we turn one and only one
burnt one single night
why did we then never die
why did the fort
keep silent
why


beneath us
deep down
stayed the dargah
the mad man danced
looked at us
in sightless eyes
we had seen him before
much before
when the hot wind
blew away advancing
and departing reasons
a maratha willingness to melt away
at each nightend
we saw him still
shaking his head
his hands sang the song
of the next blitz
the dead around in cavernous
holes never slept
we knew
the rainriver
would storm down
in crypts and crevices
in sultry memory lanes
weather broken thickets
on to those
living and buried
we knew then
it was the moment
of a quiet dismissal
of unhastened departures.


families left for far shores
and houses sprung up on
rusty dreams
a dishevelled robe dragging
a far innocence
hands sought to hold a
belief
and eyes stored tears
unbelieving
on your lips i saw a murmur
loves disparity rootless in
undefined times
i told you the stillness of the fort
stillness of our drifting
stillness of the riversong
stillness of an everydaysky
yet
we lived
shattering long drawn thoughts
in strange dawns
in
old gwalior.

Poem and Ink Drawing by Amitabh Mitra

8 comments:

  1. Amazing! It took my breath away.

    ReplyDelete
  2. किले तो यू भी खामोशियों की ईंटों से बने हैं -हमेशा.
    उनकी ऊंचाइयां उनमे बैठने वालों की नीचाइयों की
    विलोमानुपाती रही हैं.
    उनमे उगे पेड़ तक वंचित रहे हैं छाया से.
    उनके बुर्ज पर सन्नाटे के झंडे ही लहराए हैं-
    काई की सतह पर धूल की कलम ने
    अनंत आकाश पर दर्ज किये हैं उनके गुनाह-
    जो जगह कम पड़ने के चलते अक्सर
    पूरे नहीं लिखे जा सके हैं.
    सारी नदियों की धार चुरा कर
    उन्हें कैद कर दिया गया है उन सरोवरों में-
    जिनका दर्शन तक अपराध होता है.
    तीसरे तल में गूंजता है दारा शिकोह का क्रंदन
    ऊपर के दालान में गूजती हैं मृगनयनी गूजरी की सिसकी.
    अतीत इन्साफ की तलाश में खडा है दरगाह पर पागल हुआ-
    वर्तमान बाबा कपूर गेट से चढ़ कर उरवाई गेट
    से फिसल कर निकल जाता है-
    बैताल की तरह.
    उसका विक्रम इस विराट पथरीले दानव की नींव में करवट ले रहा है.
    कभी आओ. उसे मिलकर जगायेंगे.
    तुम अपनी कविता से उसका अनेस्थिसिया उतारना
    मैं अपनी अंजुरी से कुछ बूंदे उसके चेहरे पर डालूँगा.
    तुम उसे अपनी मनोहारी धुन में प्रभात का कोई राग सुनाना-
    मैं अपनी भूख से चुराकर कुछ दाने उसके मुंह में डालूँगा.
    और जब
    इस तरह जाग जायेगी नींव तो ढह जाएगा
    वह अंधियारा जो सदियों से किरणों की पहरेदारी पर लगा हुआ है
    और आज़ाद हो जाएगा सूरज
    उसकी रोशनी में हम मिलकर रचेंगे सब कुछ नया.
    तुम कविता लिखना-
    मैं उसे नक्शा बनाकर ईंट माटी से आकार दूंगा.
    और इस तरह
    पुराने ग्वालियर की विरासत को सलामत रखते हुए
    गढ़ेंगे नया ग्वालियर

    ReplyDelete
  3. A Million Thanks Badalbhai
    This is an Immortal Translation

    ReplyDelete
  4. A fine speech, a terrified scream, an untimely dusk and a dumb struck depth- all assimilated into a music in your painting and poem.

    ReplyDelete
  5. गुज़रे निशान
    -----------------
    दीवारों की सलवटें
    वक़्त की झुर्री नहीं
    दर्द की लगती हैं
    कंगूरों पर जम गयी
    ओस, धूल, पंछी विसर्जन
    की खिचड़ी
    नफरत की धमक
    दर्द की चीखों
    षड्यंत्रों की फुसफुसाहट
    छुपे वासना के प्रयासों
    की तड़क में लिपिबद्ध

    हवाओं के स्वरों
    सन्नाटों के बोल
    धुप के पसीने
    चांदनी की उमस
    मौसम का ठहरना
    जालों की बस्ती
    चिमगादड़ों की महक
    दरारों के पीपल
    झरोखों में काई
    फर्श के खरंजे
    दरवाजों पर देवता

    सिसक, खिलखिलाहट, चीख
    समेटे रेत चूने के धड में
    धूप, बरसात, जाड़ों से सड़ी चमड़ी
    को गर्व से कहीं शर्म से
    परोसे हुए खड़े
    ग्वालियर, चित्तौड़, बकिंघम
    सेंट पीटर, गोलकुंडा
    किले, दुर्ग, छतरी
    मज़ार, बावड़ी, महल
    उम्र दराज होते हैं
    किस्सों के अचार
    अफवाहों की चाशनी
    में सरोबोर
    गुज़रे निशान !!!

    ReplyDelete